Tuesday, June 2, 2009

लंड चूत

मेरे पिताजी का तबादला हो गया और हम एक नए शहर में आ गए और एक साधारण से मुहल्ले में किराए पर रहने लगे। मुझे अपने से बड़ों से दोस्ती करने का शौक था सो मेरी दोस्ती राजन और रमेश से हो गई। वे दोनों दीदी के कॉलेज में ही पढ़ते थे और बिगड़े हुए रईसज़ादे थे। दीदी बस से कॉलेज जाती थी। कुछ दिनों तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा फिर एक लड़का दीदी के पीछे पड़ गया और उसने दीदी को छेड़ना शुरु कर दिया।

दीदी बहुत परेशान रहने लगी, फिर एक दिन मुझे बता दिया। मैंने राजन से इस बारे में बात की तो उन्होंने उस लड़के को पीट दिया, और कुछ दिन तक दीदी के आने-जाने पर भी नज़र रखी। कॉलेज में भी वे उसका ध्यान रखने लगे। इधर मेरी दोस्ती भी उनके साथ बढ़ने लगी। मैं जब भी उनके साथ होता था तो अक्सर सेक्स की, विशेष रुप से घरेलू सेक्स की बातें करते थे। मुझे बहुत मज़ा आता था।

उनकी बातों से प्रेरित होकर मैंने दीदी के लिए ताक-झाँक करनी शुरु कर दी, और फिर एक दिन बाथरूम में उसे नंगी नहाते हुए देखा। पहली बार किसी लड़की को नंगा देखा... आआआहहहह्हहहह... नंगी तस्वीरें तो बहुत देखी थीं, पर वास्तविक लड़की... आआहह्हह। फिर मैंने बार-बार झाँकना शुरु कर दिया। मुझे यह हज़म नहीं हो रहा था। अब जब भी राजन और रमेश बातें करते थे, उसकी चूत-गाँड-चूचियाँ मेरी आँखों के सामने तैरने लगती थीं। राजन और रमेश ने इसे ताड़ लिया। अब वे मुझे अपनी बातों में अधिक शामिल करने लगे और मैं भी खुल गया और बातों ही बातों में उन्हें बता दिया।

"अरे वाह, तू तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला...! " राजन ने मेरी पाठ पर एक धौल जमाते हुए कहा।

"तुम लोग ऐसी बातें करते हो, तो मेरा मन फिसल गया..."

"अरे बहुत बढ़िया किया... हाय... कुँवारी चूत को आँखों से चोद रहा है...." रमेश बोला।

"यार कुछ भी कहो... तेरी बहन है माल... शरीर पर बाल हैं या चिकनी-चिकनी एक दम..."

"तू कहे तो चोद लें..."

"बात करना अलग बात है... ऐसी लड़की नहीं है वो..." मैंने कहा, तो वे दोनों मुस्कुराए।

"अब जब बात खुल ही गई है, तो तुझे बता दें कि पटा तो हमने लिया है उसे... पर तेरा लिहाज़ था सो हमने बात बढ़ाई नहीं है..." राजन ने कहा।

"वरना, वो तो कब से टाँगें फैलाए लेटी है हमारे लिए..." रमेश हँसते हुए बोला।

"शट अप... वो ऐसी नहीं है... मैं नहीं मानता..."

"तू अगर शर्त लगाए तो तेरे सामने चोद के दिखा दें..."

"शर्त मतलब...?"

"हम जीते तो तू हमें अपना जीजा मान लेना।"

????????

"और फिर हम तेरे घर में आकर ही उसे चोदा करेंगे!!!!" राजन ने कहा।

मुझे उनकी बातें बुरी नहीं लग रहीं थीं, पर बनावटी नराज़गी दिखाते हुए मैंने उनकी शर्त मान ली। फिर कुछ दिनों तक हमारे बीच कोई बात नहीं हुई। फिर एक दिन शाम को सात बजे राजन का फोन आया और उसने मुझे साढ़े आठ बजे कॉलेज की कैन्टीन में आने को कहा। दरअसल उस दिन कॉलेज का वार्षिक महोत्सव था। दीदी शाम छः बजे ही चली गई थी और दस बजे तक आने की कह गई थी। राजन के फोन का मतलब तो मेरी समझ में नहीं आया पर मैं आठ बजकर बीस मिनट पर वहाँ पहुँच गया। राजन बाहर ही खड़ा मिला और मुझे देखते ही अँधेरे कोने में ले गया...

"क्या बात है, मुझे क्यों बुलाया..."

"चुप आवाज़ मत कर... आज हम शर्त जीतने वाले हैं... राजन लेने गया है..." वह कुटिलता से हँसते हुए बोल...।

"किसे..." मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा...।

"तेरी बहन को... साले... आज तुझे अपना साला बनाएँगे..."

"मैं जा रहा हूँ... मुझे अजीब सा लग रहा है..."

"पागल है... आज सीधा प्रसारण देख... और फिर तूने वायदा किया है कि तू हमें सपोर्ट करेगा..."

मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। तभी राजन दीदी को लाते हुए दिखा। रमेश ने मुझे एक ऐसी जगह छुपा दिया, जहाँ एक खिड़की थी। कमरे में एक बिस्तर था। तभी राजन दीदी को लेकर कमरे में आया। दीदी कुछ सहमी सी तो थी, पर आई अपनी मर्ज़ी से थी। रमेश भी वहाँ पहुँच गया और उसने दरवाज़ा बन्द कर लिया।

"ये कहाँ ले आए हो... कोई आ गया तो मैं बदनाम हो जाऊँगी..." दीदी ने कुछ सहमते हुए कहा तो रमेश ने उसे बाँहों में भींचते हुए कहा...

"चिन्ता मत कर रानी... यहाँ कोई डर नहीं है..."

"नहीं.. यहाँ... नहीं..."

"अब नखरे मत कर... इतने दिनों से मौक़ा तलाश कर रहे थे..." और फिर रमेश ने उसे नंगा करना शुरु किया तो वह कुछ विरोध करने लगी, पर उन्होंने उसकी परवाह नहीं की। राजन भी वहाँ आ गया। रमेश ने उसकी शर्ट उतारी तो राजने ने उसकी जीन्स खोल दी और कुछ ही पल में वह ब्रा और पैन्टी में थी।

मेरी साँसें फूलने लगीं। राजने ने ब्रा भी खोल दी, तो दीदी नीचे बैठ गई। फिर वे भी नंगे हो गए। उनके लंड तने हुए थे। उन्होंने दीदी को उठाया और सीधे बिस्तर पर ले गए और फिर दोनों ओर से लिपट गए। वह ना-ना करती रही और वे उसके अंगों से खेलते रहे। उसे पता भी नहीं चला कि कब उसकी ब्रा-पैन्टी उसका साथ छोड़ गई। थोड़ी देर में वह भी गरम हो गई और फिर उनका साथ देने लगी, तो उन्होंने उसे सीधा किया और फिर पहले राजने ने नम्बर लिया। वह टाँगों के बीच में आया और उसकी टाँग उठा कर अपना लंड उसकी चूत की छेद पर टिका दिया। रमेश इस बीच चूचियों को सँभाल रहा था और दीदी उसके लंड से खेल रही थी कि राजन ने एक ही झटके में पूरा का पूरा लंड उसकी चूत में उतार दिया... दीदी की चीख निकलने को हुई कि रमेश ने उसका मुँह अपने होंठों से बन्द कर दिया और फिर राजन पिल पड़ा... वह कराह रही थी, पर वह पूरी ताक़त से चोदे जा रहा था। दो सौ से भी अधिक चोट मारने के बाद वह चूत में झड़ गया। दीदी निढाल सी हो गई। उसकी चूत ने भी पानी छोड़ दिया था। रमेश ने उसकी चूत कपड़े से पौंछी तो वह उठ बैठी...

"अब नहीं..."

"अच्छा... अब मेरा नम्बर आया तो नहीं कर रही है...?" चूत पौंछ कर वह बगल में लेट गया।

"थोड़ा रुक कर, कर लेंगे..."

"चिन्ता मत कर, मैं उस राजन की तरह गँवार नहीं हूँ... प्यार से चोदूँगा।"

और फिर वह उसे चूमने-चाटने लगा। जब वह थोड़ी सामान्य हुई, तो वह ऊपर लेट गया और लंड चूत की दरार में रगड़ने लगा। दीदी की चूत फिर गरम होने लगी तो रमेश ने धीरे से लंड चूत में उतार दिया और फिर पहले धीरे-धीरे चोदने लगा। जब वह पूरी तरह से मज़े लेने लगी तो उसने गति बढ़ा दी। वह आह्ह्हह... आह्हहह करने लगी, पर रमेश ने भी पूरी ताक़त से उसकी चूत ठोंकी। वह निढाल हो चुकी थी। वे दोनों भी उसकी बगल में लेट गए तो मैं भाग आया।

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